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इतना पूजनीय कर दो वृक्ष को की कभी कोई न काट पाए

टेक्नोलॉजिकल उन्नति के तरफ अग्रसर हो रहे देश-दुनिया को पेड़ पौधों का महत्व और वृक्षारोपण के लिए जागरूक और उत्साहित करने का प्रयास इस हिंदी कविता द्वारा करने की कोशिश की गई है। "हो मूर्ति विसर्जन से निकला पौधा या हो कब्र पर झूमती फूलों की बेल ये सौगात है एक नए जीवन की जो है जाने वालों का खेल। इसकी सेवा वैसे ही करो जैसे की वे जानेवाले की धरोहर हो। तिनका-तिनका बढ़ते देख मन खुशी से सरोवर हो। इतना पूजनीय कर दो वृक्ष को की कभी कोई न काट पाए। दोस्त तो दोस्त दुश्मन भी उसकी छाँव में सुस्ताये। इतना पूजनीय कर दो वृक्ष को की कभी कोई न काट पाए" 🙏 🌱🌺🏵️🌼🌹🌳🌾🌿🍂🍁🌲🌵🌴🌷🥀💮🌸🌼 #PlantWhateverYouCan

दिवाली : गांव VERSUS शहर की दीपावली

दिवाली का त्यौहार दिए की दीपक से हुयी रोशनी का त्यौहार है। इसे दीपावली भी इसीलिए बुलाते हैं क्यों क्यूंकि इसी दिन मिट्टी के दिया से घर-आँगन को रोशनी से प्रज्ज्वलित करते हैं और घर में श्री गणेश - लक्ष्मी की आराधना और पूजा अर्चना करते हैं।  हिन्दु मान्यताओं के अनुसार दिवाली के शुभ दिन के सुअवसर पर घर या दुकान में गणेश-लक्ष्मी की स्थापना और पूजा की जाती हैं। और मनोकामना की जाती है के बुद्धिमान गणेश और धनवान माता लक्ष्मी यूँ ही पुरे साल घर में उसी स्थान पर विराजे रहे जहाँ उनकी पूजा इस दिवाली में की गयी है। दीपावली या दिवाली का त्योहार जगमगाती रोशनी और धूम-धाम करते हुए पटाखों का दिन है. अनेको तरह के पटाखे जलाये जाते है जो जलने के बाद भी धुआं छोड़ते रहते हैं।  आज मैं आपके सामने देश के विभिन्न भागों में दिवाली मनाने के अलग-अलग ढंग को पेश करूँगा जो की मैंने पिछले कुछ सालों से तस्वीरों में संजो कर रखा हुआ था ताकि आज आपके सामने ला सकूँ।  सही मायने में दिवाली ही एक ऐसा पर्व है जिसे धूम-धाम से मनाया जाता है।  मैं उस धूम-धाम की बात कर रहा हूँ जो पटाखे की आवाज़ से होती है। ...

कोलकाता के थीम दुर्गा पूजा के सभी फोटो - Durga Puja Photo Throwback

कोलकाता पश्चिम बंगाल की राजधानी है। इसे भारत का सिटी ऑफ़ जॉय भी कहा जाता है यानि एक ऐसा शहर जो खुशियों से भरा हो। मैं तो इसे त्योहारों की राजधानी मानता हूँ। ऐसा ही एक त्योहार है दुर्गा पूजा जिसे देश के अन्य भागों में दशहरा या दसरा के नाम से भी जाना जाता है। वैसे दुर्गा पूजा और दशहरा में उतना ही अंतर है जितना की नवरात्री और दुर्गा पूजा में है। चाहे नाम जो भी हो पर देवी दुर्गा की आराधना ही इस पर्व का मूल उद्देश्य होता है। कोलकाता-वासी साल भर राह देखते रहते हैं के कब दुर्गा पूजा आए और उनकी खुशियों में चार चाँद लगे। इसकी उलटी गिनती ओडिशा के प्रसिद्द श्री जगन्नाथ जी के 'रथ यात्रा' के दिन से शुरू हो जाती है। कमोवेश रथ पूजा के बाद से 100 दिन शेष रह जाते हैं दुर्गा पूजा के लिए जो की तैयारियां शुरू कर देने का उद्घोष होता है। बंगाली समाज में माता रानी से इतना लगाव है की कोलकाता और बंगाल के सभी जिलों में दुर्गा पूजा बड़े ही धूम-धाम से मनाई जाती है। गली हो या मोहल्ला, थोड़ी सी जगह हो या बड़ी-चौड़ी जगह दुर्गोत्सव के रूप-रंग में ढलने में किसी भी प्रकार की कठिनाई नहीं होती। बड़ी ही सरलता...